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सिकंदर


सिकंदर मरा जिस् नगर से उसकी अर्थी निकाली गई । वहा के लोगो ने देखा की अर्थी मे से सिकंदर के हाथ बाहर रखे गये थे । सबने पुछा तो पता चला की सिकंदर ने मरनेसे पहेले कहा था मेरे हाथ बाहर रखना ताकि लोगो को पता चले के में भी खली हाथ जा रहा हु ।


क्या कोइ एसी संपदा नहीं हे जिसे मृत्यु मिटा न सके

किसी भी सम्पदा को मृत्यु की कसोटी पर रखना और देखना ये सोना हे या मिटी

जो मृत्यु के बाद बचता हे वो तुम हो

में कोन हु

ओस्पेन्सकी ने गुरजिएफ से मिलनेसे पहेले एक बहोत कीमती किताब " टशियम आरगेनम " लिख चुकाथा पश्चिम के ईतीहास में लिखी गयी तीन किताबो में एक महत्वपुणँ किताब हे । और गुरजिएफ को कोय जानता भी नहीं था एक अनजान फ़कीर था जब ओस्पेन्सकी मिलने गया गुरजिएफ से कोय बीस मित्रो के साथ चुपचाप बेठा हुआ था । ओस्पेन्सकी भी थोडी देर बेठा फिर घबडाया न तो किसी ने परिचय कराया की कोन हे न गुरजिएफ ने पुछा की केसे आये हो बाकि जो बीस लोग थे वह भी चुपचाप बैठे थे तो चुपचाप ही बैठे रहे । पाच सात मिनिट के बाद ओस्पेन्सकी बेचनी बहोत बढ़ गयी । न वहा से उठा सके न बोल सके आखिर हिम्मत जुटाकर उसने कोई बीस मिनिट तक तो बर्दास्त किया , फिर उसने गुरजिएफ से कहा की माफ़ करिये यह क्या हो रहा हे ? आप मुझसे यह भी नहीं पूछते की में कोन हु ?

गुरजिएफ ने आंखे उठा कर ओस्पेन्सकी की तरफ देखा और कहा , तुमने खुद कभी अपने से पुछा हे की में कोन हु और तुम ने ही नहीं पूछा , तो मुझे क्यों कष्ट देते हो ? या तुम्हे अगर पता हो की तुम कोन हो तो बोलो । तो ओस्पेन्सकी के निचे से जमीन खिसकती मालूम पड़ी अब तक तो सोचा था की पता हे की में कोन हु ओस्पेन्सकी ने सब तरह से सोचा कही कुछ पता न चला की में कोन हु ? ।



गुरजिएफ ने कहा बेचनी में मत पडो कुछ और जानते होतो उस संबंध में ही कहो । कुछ नहीं सूझा तो गुरजिएफ ने एक कागज उठाकर दिया और कहा . हो सकता हे संकोच होता हो पास के कमरे में चले जाओ इस कागज पर लिख लाओ जो -जो जानते हो उस संबंध में फिर हम बात न करेगे और जो नहीं जानते हो उस संबंध में कुछ बाते करेगे ओस्पेन्सकी कमरे में गया उसने लिख हे सर्द रात थी लेकिन पसीना मेरे माथे से बहना शुरू हो गया पहेली दफा में पसीने - पसीने हो गया पहेली दफा मुझे पता चला की जानता तो में कुछ भी नहीं हु . सब शब्द मेरी आंखो में धूम ने लगे और मेरे ही शब्द मुझसे कहेने लगे




ओस्पेन्सकी तुम जानते क्या हो .......




और तब इसने वह कोरा कागज ही लाकर गुरजिएफ के चरणो में रखा दिया और कहा में कुछ नहीं जानता गुरजिएफ ने कहा अब तू जान ने की और कदम उठा सकता हे ।



आप क्या जानते हे ..... ?

हमारी पकड़

अंधेरी रात में एक आदमी एक पहाड़ के कगार से गिर गया । अंधेरा था भयानक नीचे खाय थी बड़ी । किसी व्रुक्ष की जड़ो को पकड़ कर लटका रहा । चिल्लाया , चीखा , रोया । अंधकार धना था दूर-दूर तक कोई भी न था । सर्द रात थी कोय उपाय नहीं सुझता था व्रुक्ष की जड़े हाथो से छुटती मालूम पड़ती थी हाथ ठंडे होने लगे , बर्फीले होने लगे रात गहेराने लगी वह आदमी चीखता चिल्लाता हे व्रुक्ष की जड़ो को पकडे हे सारी ताकत लगा रहा हे ठीक उसकी हालत वेसी थी जेसी हमारी हे पकडे हे धन को पद को जोर से पकडे हुए हे की छुट न जाये कुछ ।
लेकिन कब तक पकडे रहेता आखिर पकड़ भी तो थक जाती हे । और मजा तो ये हे की जितना जोर से पकडो उतने जल्दी थक जाते हे जोर से पकडा था , उंगुलियों ने जवाब देना शुरु कर दिया धीरे धीरे आंखो के सामने हाथ खिसक ने लगे । लेकिन कब तक पकडे रहेता आखिर पकड़ भी तो थक जाती हे । और मजा तो ये हे की जितना जोर से पकडो उतने जल्दी थक जाते हे जोर से पकडा था , उंगुलियों ने जवाब देना शुरु कर दिया धीरे धीरे आंखो के सामने हाथ खिसक ने लगे जड़े हाथ से छुटने लगी चिल्लाया रोया लेकिन कोय उपाय नहीं रहा आखिर हाथो से जड़े छूट गयी ।
लेकिन तब उस घाटी में हंसी की आवाज गूंज उठी क्योकि नीचे कोय खाय नहीं थी जमीन थी अंधेर में दिखाय नहीं पड़ती थी वह नाहक ही परेसान हो रहा था और इतनी देर जो कष्ट उठाया वो अपनी पकड़ के कारण ही उठाया वह घाटी तो चीख पुकार से गूंज रही थी हंसी की आवाज से गूंज उठी वह आदमी अपने पर हंस रहा था ।
जिन लोगो ने पकड़ के पागलपन को छोड़ कर देखा हे वे हँसे हे क्योकि जिस से वो भयभीत हो रहे थे वह हे ही नहीं । जिस म्रृत्यु से भय भीत हम हो रहे हे वह हमारी पकड़ के कारण ही प्रतीत होता हे ।
पकड़ छुटते ही वह नहीं हे । जिस दुख से हम भयभीत हो रहे हे वह दुख हमारी पकड़ का हिस्सा हे ।
पकड़ से पैदा होता हे पकड़ छुटते ही खो जाता हे । और जिस् अंधेंरें में हम पता नहीं लगा पा रहे हे
की कहा खड़े होंगे वही हमारी अंतरात्मा हे । सब पकड़ छुटते हे हम अपने में ही प्रतिष्ठित हो जाते हे

आपने भी तो कूछ पकडा हुआ नहीं हे ना..... छोड़ दो उसे फिर हँसी आयेगी ।

उपवास




आज एक दोस्त के घर जाना हुआ दोस्त बहार गया था तो उसके इंतजार में उसके
दादाजी के पास बेठा बातो बातो में उसके दादाजी ने कहा की आप उपवास रखते हो मेने सोचा क्या बोलू हा या ना मगर मेरे कूछ बोलने से पहेले ही उसने कहा आज कल के लड़के कुछ भक्ति वाला काम नहीं करते वेसे भी मेरी ईमेज नास्तिको वाली हे अब दादाजी से में नहीं पुछ सका की आप उपवास का मतलब समज ते हे ।
मगर आप से जरुर पुछु गा की आप उपवास का मतलब समजते हे
उपवास का अर्थ होता हे अपने पास होना अपनी आत्मा के पास होना इसलिए जो व्यक्ति अपने पास होता हे उसे भूख कम लगती हे अपने पास होना याने आनंद में होना शरीर के पास होना याने दुख में हो ना दुखी आदमी अपने को भर ने की चेष्टा करता हे तो वह भोजन से भरेगा जब आनंद से भर जाओगे तो भूख का पता भी नहीं लगता याद भी नहीं आती बच्चे अक्सर खेलने में अपने पास होते हे उसे भोजन की याद भी नहीं आता

चित्रकर ईतना डूब जाता हे अपने चित्र में उसे भोजन की याद तक नहीं आती , संगीतकर डूब ता हे संगीत में , सायंटिस्ट डूब ता हे अपने प्रयोग में बुद्ध, महावीर , जीसस , महम्मद पैगम्बर , नानक , कबीर ,कृष्ण सबने पा लिया आपने आप को उतर गए उपवास में अपनी आत्मा के पास

मगर हमने उपवास का अलग मतलब ही नीकाल लिया हे
पंडित , पुरोहित , मोलवी , चर्च के फ़ाधर ने अपनी दुकान चलाने के रास्ते निकाले हे शायद
वो भी बेचारे क्या करे वो हे लकीर के फ़कीर उसे खुद भी पता नहीं वो क्या कह रहे हे
उपवास करना नहीं होता वो तो होता हे अपने आप
ब्लॉग में कभी मेरा भी उपवास हो जाता हे

आज के हालात

नदी में डूबते हुए आदमी ने पुल पर चलते हुए आदमी को आवाज़ लगायी "बचाओ बचाओ" पुल पर चलते आदमी ने निचे रस्सी फेकी और कहा आओ नदी में डूबता हुआ आदमी रस्सी नहीं पकड़ पा रहा था रो रो कर चिल्ला रहा था में मरना नहीं चाहता ज़िंदगी बड़ी मेहेंगी है कल ही तो मेरी एक कंपनी में नौकरी लगी है .. इतना सुनते ही पूल बराबर चलते आदमी ने अपनी रस्सी खीच ली और भागते भागते वो कंपनी में गया उसने वहां बताया की अभी अभी एक आदमी डूबकर मर गया है और तरह आपकी कंपनी में एक है जगह खाली कर गया है ... में बेरोजगार हूँ मुझे ले लो .. रेसप्सनिस्ट बोली दोस्त तुमने देर कर दी, अब से कुछ देर पहले हमने एक आदमी को लगाया है जो उसे धक्का दे कर तुमसे पहले यहाँ आया है!

Story Post By Milan Patel
http://www.aminij.com/

Ticket to Heaven



सालो से स्वर्ग में मुक़दमा चल रहा था की


स्वर्ग में आने की टिकिट अब ईन्टरनेट पर भी मिलनी चाहिये
आज तक ये अधिकार सिर्फ मंदिर , मस्जिद , चर्च वालो कोही मिले हुए थे
धर्म के ठेकेदारोने बहोत ही हो हल्ला किया . उसने दलील में कहा की ऐसा हुआ तो हमारा धंधा
बंध हो जायेगा मगर हमारे वकील ने सामने दलील देते हुए कहा की समय के साथ बदलाव आना
जरुरी हे ऊपर से स्वर्ग की हालत भी खस्ता हे ये धर्म के ठेकेदारो सारा पैसा खा जाते हे

स्वर्ग में सदियो से रिनोवेसन नहीं भी नहीं हुआ

ईन्टरनेट के माध्यम से बुकिंग करे गे तो हिसाब भी पूरा मिलेगा
स्वर्ग की इनकम भी तेजीसे बढेगी और सुविधा भी बढेगी इस दलील पर हम ये मुक़दमा जित गए


मेरे पास स्वर्ग की टिकिट बेचने के अधिकार हे आप मेसे कोय भी खरीद सकता हे
जल्दी कीजीये मंदी की वजह से अभी 50% डिस्काउंट चल रहा हे ।
मुझे फोन करे 09824121569 या
email करे raju_1569@yahoo.com

HABIT - आदत


एक आदमी को सिगरेट पीने की आदत हे , उसे सारी दुनिया बुरा कहेती हे . दुसरे को माला फेर ने की आदत हे , उसे सारी दुनिया अच्छा कहेती हे . जो सिगरेट ना पिए तो मुसीबत मालूम पड़ती हे . जो माला फेर ताहे अगर न फेरने दो तो मुसीबत मालूम पड़ती हे दोनों गुलाम हे ।
एक को उठते ही सिगरेट चाहिए , दुसरे को उठते ही माला चाहिए माला वाले को माला न मिले तो माला की तलफ लगती हे अगर न फेरने दो तो मुसीबत मालूम पड़ती हे , दोनों गुलाम हे ।
एक को उठते ही सिगरेट चाहिए. एसे बुनियाद में बहोत फासला नहीं हे सिगरेट भी एक तरह का माला फेरना हे धुआं भीतर ले गए, बाहर ले गये ,भीतर ले गए, बाहर ले गये - मनके फिरा रहे हे ,बाहर ,भीतर . धुएं की माला हे . जरा सुक्ष्म हे . मोती के माला स्थुल हे . कोय आदत इसी नहो जाए की मालिक बन जाये . मालकियत बचाकर आदत का उपयोग कर लेना यही साधना हे मालकियत खो दी , और आदत सवार हो गई तो तुम यंत्रवत हो गए अब तुम्हारा जीवन मूर्च्छित हे ।

इसे लोग भी हे जो पूजा न करे रोज , तो बेचेनी लगती हे , उसे पुछो की पूजा करने से कुछ आनंद मिलता हे ? वो कहते हे , आनंद तो कुछ मिलता नहीं लेकिन न करे तो बेचेनी लगती हे
आदते बुरी होया भलि, इससे कोई भेद नहीं पड़ता जब आदते मालिक हो जाये तो बुरी हे .तुम मालिक रहो तो कोय आदत बुरी नही गुलामी बुरी हे मालकियत भली हे ।

संसार में कुछ भी बुरा नहीं हे स्वामित्व तुम्हारा हो तो संसार में सभी कुछ अच्छा हे स्वामित्व खो गया तुम गुलाम हो जाओ तो आदते बुरी हो या भलि, इससे कोई भेद नहीं पड़ता जब आदते मालिक हो जाये तो बुरी हे .तुम मालिक रहो तो कोय आदत बुरी नही गुलामी बुरी हे मालकियत भली हे जीवन में आदते जरुरी हे . बस इतना ध्यान रखना की आदत मालिक न हो जाये . स्वामित्व खो गया तुम गुलाम हो जाओ तो वह गुलामी चाहे कितनी ही कीमती हो , खतरनाक हे . हीरे - जवाहरात लगेहो जंजीरों पर तो उसको आभुषण मत समझ लेना वे खतरनाक हे वह महेगा सोदा हे ।

अपने को गंवाकर इस जगत में कमाने जेसा कुछ भी नहीं हे
.

स्व + भावः




एक आदमी ने बुध्ध के मुह पर थूक दिया
उन्होंने अपनी चादर से थूक पोंछ लिया
और उस आदमी से कहा , कुछ और कहेना हे ?
बुध्ध ने कहा , यह भी तेरा कुछ कहेना हे ,
वह में समज गया ; कुछ और कहेना हे ?
आनंद बुध्ध का शिष्य था , बहोत क्रोधित हो गया ,
वह कहें ने लगा , यह सीमा के बहार बात हो गयी

बुध्ध का चचेरा भाई था उसकी भुजाए फड़क उठी , उसने कहा बहोत हो गया
वह भूल ही गया के वो भिक्षु हे , सन्यासी हे बुध्ध ने कहा की उसने जो किया वो क्षम्य हे ।
तू जो कर रहा हे वो और भी खतनाक हे उसने कुछ किया नहीं सिर्फ़ कहा हे

कभी ऐसी घडियां होती हे जब तुम कुछ कहेना चाहते हो , लेकिन कह नहीं सकते
शब्द छोटे पड़ जाते हे . किसी को हम गले लगा लेते हे .कहेना चाहते थे , लेकिन इतना ही कहने से कुछ काम न चलता की मुझे बहोत प्रेम हे - वह बहुत साधारण मालूम पड़ता हे - तो गले लगा लेते हे
इस आदमी को क्रोध था वह गाली देना चाहता था लेकिन गाली इसको कोई मजबूत नहीं मिली
इसने थूक कर कहा . बात समज में आ गयीहम समज गए इसने क्या कहा अब इसमे झगडे की क्या बात हेउस आदमीसे बुध्ध ने पूछा आगे और कुछ कहे ना हे ॥?

वह आदमी शमिँदा हुआ . वह बुध्ध के चरणों में गिर पड़ा उसने कहा मुझे क्षमा कर दे .
में बड़ा अपराधी हुं और आज तक तो आपका प्रेम मुझ पर था , अब मेने अपने हाथ से गंवा दिया .
बुध्ध ने कहा की तू उसकी फिकर मत कर क्योकि में तुझे इसलिए थोड़े ही प्रेम करता था की मेरे ऊपर थूकता नहीं थामुजसे प्रेम वैसा ही हें जेसे की फुल खिलता हें और सुगंध बिखर जाती हें
अब दुश्मन पास से गुजरता हें उसे भी वह सुगंध से भर देगी वह खुद ही रुमाल लगा ले , बात अलग . मित्र निकल ताहे थोडी देर ठहर जाए फुल के पास और उनके आनंद में भागीदार हो जाए बात अलग कोई न निकले रास्ते से तो भी सुगंध बहेती रहेगी

क्योकि मेरा स्वभाव प्रेम हें

आप भी देखे आप का स्वभाव क्या हें

स्वभाव यानि स्व + भावः आप को क्या अच्छा लगता हें
प्रेम , शान्ती, करुना , लोभ , दया , लालच , ईषा , क्रोध ................
जेसा आप का स्वभाव होगा वेसी ही आप के आस पास सुगंध होगी



गाँव के नेताजी

एक आदमी ने गाँव के नेता जी को किसी बात पर सच्ची बात कह दी ।
कह दिया कि उल्लू के पटृठे हो!

अब नेताजी को उल्लू का पटृठा कहो तो नेता जी कुछ ऐसे ही नहीं छोड देगें।
उन्होनें अदालत मे मुकदमा मानहानि का चलाया।मुल्ला नसरुद्दीन नेता जी के पास ही खडा था तो उसको गवाही मे लिया ।

जिसने गाली दी थी नेताजी को , उसने मजिस्ट्रेट को कहा कि होटल में कम से कम पचास लोग ,जरुर मैने उल्लू का पटृठा शब्द का उपयोग किया है; लेकिन मैने किसी का नाम नही लिया । नेता जी कैसे सिध्ध कर सकते हैं कि मैने इन्ही को उल्लू का पटृठा कहा है।

नेता जी ने कहा : सिध्ध कर सकता हूँ। मेरे पास गवाह हैं। मुल्ला को खडा किया गया ।
मजिस्ट्रेट ने पूछा कि मुल्ला , तुम गवाही देते हो कि इस आदमी ने नेता जी को उल्लू का पटृठा कहा है! मजिस्ट्रेट ने कहा : तुम कैसे इतने निशिचत हो सकते हो? वहाँ तो पचास लोग मौजूद थे, इसने किसी का नाम तो लिया नहीं। नसरुद्दीन ने कहा : नाम लिया हो कि न लिया हो, पचास मौजूद हों कि पांच सौ मौजूद हों , मगर वहां उल्लू का पटृठा केवल एक था ।

वह नेता जी ही थे ! मै अपने बेटे की कसम खाकर कहता हूँ कि वहां कोई और दूसरा उल्लू का पटृठा था ही नहीं , यह कहता भी तो किसको ?

जुते की चाहना


जुते की चाहना

चाह नहीं मैं नेता मंत्री के
ऊपर फेंका जाऊँ,

चाह नहीं प्रेस कान्फ्रेंस में
किसी पत्रकार को ललचाऊँ,

चाह नहीं, किसी समस्या के लिए
हे हरि, किसी के काम आऊँ

चाह नहीं, मजनूं के सिर पर,
किसी लैला से वारा जाऊँ!

मुझे पहन कर वनमाली!
उस पथ चल देना तुम,
संसद पथ पर देस लूटने
जिस पथ जावें वीर अनेक।

(श्रद्धेय माखनलाल चतुर्वेदी की आत्मा से क्षमायाचना सहित,)

One Invention Change The World




अगर में आप से पुछु के पीछले 1000 सालमे कोन से आविष्कार ने हमारी दुनिया बदल दी
आप कहेगे की बिजली , फोन ,या टेलीविजन
नहीं इन मेसे कोय भी नहीं


हमारी दुनिया बदलदी एक हाथ से चलने वाले प्रिंटिंग प्रेस ने
ये आविष्कार तब हुवा था जब आप इस दुनिया में नहीं थे
आप के दादा भी नहीं थे उनके दादा भी नहीं थे
तो आप पूछे गे के आप को केसे पता चला
उनके प्रिंटिंग प्रेस के वजह से ही तो पता चला

ये बात हे 1400 साल में जन्मे जोहान Gutenberg की
उस समय सभी किताबे हाथो से लिखी जाती थी

1436 में जोहानिस Gutenberg नें अपने प्रेस में निर्माण शुरू किया
लकडी के ब्लॉक बनाये और हाथोसे प्रेस कर के प्रिंटिंग कर ता था
ब्लॉक पत्रों की तुलना में बेहतर थे

जोहान Gutenberg को पता नहीं था कि उसने क्या आविष्कार किया हे वो तो बिचारा 3 फ़रवरी, 1468 Mainz, जर्मनी में गरीबी में मर गया पर उनके आविष्कार ने पूरी दुनिया बदल दी

एक सदी से दूसरी सदी की जान कारिया हमारे पास पहुची किताबो से हम आज जो कुछ भी जानते हे सब किताबो में सग्रहीत था
विद्युत शक्ति के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडीसन जन्म हुवा 11 फ़रवरी 1847 उसने भी किताबे से ही जानकारी हासिल की या रेडियो के आविष्कारक मारकोनी , फोन के आविष्कारक ग्राहम बेल , अल्बर्ट आइंस्टीन, 1921 सभी ने किताबो कि मदद ली ये सीखा कि नहीं आये थे

Johannes Gutenberg इतिहास सब से बड़ा आविष्कारक जो मरने तक गरीब रहा
उसे मेरा सलाम

Johannes Gutenberg ( johaan Gutenberg )
जन्म: c1400 Mainz, जर्मनी में
मौत: 3 फ़रवरी, 1468 Mainz, जर्मनी में
राष्ट्रीयता: जर्मन

अभाव के कारण


इजिप्त के राजा ने सुना की कोईँ आदमी अकेला रहेगा
सब तरह से स्वस्थ होगा फिर भी वह पागल हो जायेगा
तो राजा ने एक स्वस्थ युवक जो सब तरह सुखी था अकेले में रखा दिया

उस से कोईँ भी न मिल सके एसी व्यवस्था कर दी गए
उसकी सब सुविधा का ध्यान रखा जाता था
पर वो युवक दो तीन दिन बात बात पर बड़ा परेशान रहेने लगा
चिल्लाने लगा गुस्सा होने लगा


एक सप्ताह के बाद वो वहाँ पे रहेने को राजी हो गया
यानि के वो अब शांति से रहे ने लगा
और एक महीने के बाद वो युवक अपने आप से बाते कर ने लगा
पागल पन के कुछ लक्ष्ण दिखाय देने लगे
और तिन महीने बाद वो पागल हो गया


कोई भी आदमी अपने भीतर से बचने केलिए नशा करने लगता हे , भजन , कीर्तन करने लगता हे
माला फेरने लगता हे फिल्म ,टीवी , न्यूज़ पेपर इन सभी में
हम सारे लोग खुद को भुल ना चाहते हे .
भीतर की रिक्त ता को भुला देना चाहते हे
बड़ा पद , धन येसब अपने से बचने के बहाने हे

बहार की दोड़ भीतर की रिक्त ता को नहीं भर पाती
अभाव को भर के के लिए हम मित्र खोजते हे , सभा में जाते चाहे वो किसी की भी हो चुनावी , धार्मिक , जहा लोगो की भीड़ हो ताकि हम अपने से बच सके , संगीत सुनते हे , धर्म के नाम पर जगडें करते हे एतिहास में जितने युध्ध हुए वे सब दुसरे किसी कारण नहीं भीतर के अभाव के कारण हुए हे

जिंदगी के सारे प्रश्नों की जड़ ही अन्दर का अभाव हे
आप भी खुदके पास 30 मिनिट बैठ के देखे

नहीं बैठ पायेगे उब के भाग जाये गे
या फिर कोई बाहाना बना लेगे .........आज नहीं कल और कल कभी आता नहीं


हिटलर


जो असत्य बार बार प्रचलित किया जाता हे ।
वो सत्य प्रतीत होने लगता हे ...
हिटलर

हिटलर ने यही किया


किसी भी जुठ को बार बार दोहरा नेसे सच मालूम पड़ ने लगता हें ।

प्यास ( Receptivity )


एक गाँव में एक हजार के करीब बस्ती थी जहा से एक फ़कीर का निकलना हुआ
तो गाँव के एक आदमीने फ़कीर से पुछा की

आप लोगो को मंदिर के सबंध में सत्य के सबंध में समजाते हे
कितने ही लोगो को समजाया होगा मगर उस मेसे किसी को सत्य मिला , मोक्ष मिला .....?


फ़कीर ने कहा आप मुझे कल सुबह मिलने आना


वह सुबह फ़कीर से मिले गया । तो फ़कीर ने कहा तु गाँव में जाओ

और गाँव में सभी आदमियों की आकाँक्षा क्या हे वो जान के सूचि बनाकर लेआना
वह आदमी गाँव में गया और सब से पूछा की आपकी क्या इच्छा हे क्या
आकाँक्षा हे किसीने धन माँगा किसी ने पद , ज़मीन जायदाद , ........


वो आदमी सूचि बना कर फ़कीर के पास आया उसने फ़कीर को सूचि बताए
फ़कीर ने कहा इसमे से कोय भी सत्य नहीं चाह्ता तो में उसे नहीं दे सकता


में लोगो को पानी दे सकता हु प्यास नहीं

अगर आपके भीतर प्यास नहीं हे
तो कुवे पर भी हम खड़े हो जाये तो भी

पानी नही दिखेगा पानी उसे दिखाय देगा जो प्यासा हे


आप को क्या चाहीये सूचि में लिखवा दीजीये॥


आप कोभी मिलेगा पर प्यास ( Receptivity ) होनी जरुरी हे ।

धनपती



एक धनपति बीमार था . मरन सया पर था जीवन भर धन की दोड़ रही थी वह मर रहा था .
आखरी क्षण आँख खुली उसने कहा बड़ा लड़का कहा हे उसकी पत्नि ने कहा आप के पास ही हे !
उसके पाच लड़के थे बारी बारी सब को पुछा तो पत्नि को अच्छा लगा ,

क्योकि आज तक किसी के बारे में पुछा ही नहीं था ! पत्नि ने कहा सभी आप के पास ही हे .
तो धनपती ने कहा सभी यहा पे हे तो फिर दुकान पर कोंन हें .
जो व्यक्ति धन में जितना आतुर होगा उतना प्रेम कम होगा
ये बिलकुल आनिवार्य हें ।


जीवन में जितना प्रेम होगा उतना धन पर पकड़ कम हो जायेगी
आप देखे आप के पास किस की ज्यादा पकड हें ..........

बेचेनी


राह पर तुम खड़े हो एक सुंदर कार निकली ...
क्या हुआ आप के मनको ? कार का प्रतिबिब गूंजा कार के निकल नेसे कुछ नहीं होता
अगर आप का देखना तटस्थ हो जेसे केमरे की आखा होती हे
लेकिन जब वो कार तुम्हारे भीतर से निकल रही हे ,-- ऐसी कार मेरे पास हो ! लहर उठी
जेसे पानी में किसीने कंकड़ फेका और लहर उठी । कार तो जा चुकी , अब लहर तुम्हारे साथ हे .

अब वो लहेरे तुम हे चलाएगी .
तुम धन कमाने में लगोगे , या तुम चोरी करने में लगोगे , या किसी की जेब काटोगे .
अब तुम कुछ करोगे . अब वृति तुम्हारी कभी क्रोध करवाएगी ,अगर कोई बाधा डालेगा . अगर कोय मार्ग में आएगा तो तुम
हिंसा करनेको उतारू हो जाओगे , अगर कोय सहारा देगा तो तुम मित्र हो जाओगे , अब
तुम्हारी राते इसी सपने से भर जायेगी . बस यह कार तुम्हारे आसपास धूम ने लगेगी .
जब तक यह न हो जाए , तुम्हे चेन न मिलेगा
और मजा तो येहे की वर्षो की महेनत के बाद जिस् दिन यह कार तुम्हारी हो जायेगी , तुम अचानक पाओगे , कार तो अपनी हो गयी , लेकिन अब ? इन वर्षो की बेचेनी का अभ्यासः हो गया . अब बेचेनी नहीं जाती , क्योकि बेचेनी का अभ्यासः हो गया
अब तुम इस बेचेनी के लिए नया कोई यात्रा पथ खोजेगे . बड़ा मकान बनाना हे ! हीरे - जवाहरात खरीदने हे ! अब तुम कुछ और करो गे , क्योकि अब बेचेनी आदत हो गयी , लेकिन अब कार का मिलना न मिलना बराबर हे . अब बेचेनी पकड़ गयी .
चेन से न रह सके , सोच की धनि जब धनि हो जायेगे तब चेन से रह लेगे . अगर बेचेनी का अभ्यास घना हो गया , तो धनि तो तुम हो जाओगे , बेचेनी कहा जाएगी ? तब और धन की दोड़ लगती हे और मन कहेता हे और धनी हो जाए फिर . लेकिन सारा जाल मन का हे
आप भी देखो कही बेचेनी ने तो नहीं पकडा हे
रोज सुबह उठा के भागने का तो मन नहीं करता हे .................

सम्राट बनो

एक फकीर हुआ, उस फकीर के पास एक सम्राट गया। सूफी फकीर था। उस सम्राट ने कहा कि मुझे भी परमात्मा से मिला दो। मैं भी बड़ा प्यासा हूं। उस फकीर ने कहा, तुम एक काम करो। कल सुबह आ जाओ। तो वह सम्राट कल सुबह आया। और उस फकीर ने कहा, अब तुम सात दिन यहीं रुको। यह भिक्षा का पात्र हाथ में लो और रोज गांव में सात दिन तक भीख मांग कर लौट आना, यहां भोजन कर लेना, यहीं विश्राम करना। सात दिन के बाद परमात्मा के संबंध में बात करेंगे। सम्राट् बहुत मुश्किल में पड़ा। उसकी ही राजधानी थी वह। उसकी अपनी ही राजधानी में भिक्षा का पात्र लेकर भीख मांगना। उसने कहा कि अगर किसी दूसरे गांव में चला जाऊं ? तो उस फकीर ने कहा, नहीं गांव तो यही रहेगा। अगर सात दिन भीख न मांग सको तो वापस लौट जाओ। फिर परमात्मा की बात मुझसे मत करना।



सम्राट झिझका तो जरूर, लेकिन रुका। दूसरे दिन भीख मांगने गया बाजार में। सड़कों पर, द्वारों पर खड़े होकर उसने भीख मांगी। सात दिन उसने भीख मांगी। सात दिन के बाद फकीर ने उसे बुलाया और कहा, अब पूछो। उसने कहा, अब मुझे कुछ भी नहीं पूछना। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि यह सात दिन भिक्षा का पात्र फैला कर मुझे परमात्मा दिखाई पड़ जाएगा। फकीर ने कहा, क्या हुआ तुम्हें ? उसने कहा, कुछ भी नहीं हुआ। सात दिन भीख मांगने में मेरा अहंकार गल गया और पिघल गया और बह गया। मैंने तो कभी सोचा ही नहीं था कि जो सम्राट् होकर न पा सका, वह भिखारी होकर मिल सकता है। और जिस क्षण विनम्रता का भीतर जन्म होता है, ह्युमिलिटी का, उसी क्षण सच्चा सम्राट् पैदा होता हे

आप भी देखे परमात्मा और आप के बिच अहंकार तो नही , पर उसे पहेले आप को सम्राट होना पड़ेगा भिखारी कभी परमात्मा खोजने नही जाएगा उसे अभी बहोत सी प्यास बुजनी बाकि हे मकान , गाड़ी , पैसा , यस , वो सब आप पालो अपनी प्यास बूजा लो ..........


सम्राट वो हे जिस की सभी प्यास बुज चुकी हो ।


तभी तो राम , बुद्ध, महावीर , जीसस , महम्मद पैगम्बर , नानक , कबीर , जेसे सम्राटो ने दुनिया बदल दी.....


हवाई जहाज या बैलगाड़ी


दूसरे महायुद्ध बर्मा के एक जंगल में एक छोटा हवाई जहाज छूट गया । जंगल में रहने वाले आदिवासी हवाई जहाज का क्या करें ! हवाई जहाज है, यह भी उसकी समझ में न आए। वे तो बैलगाड़ी को ही जानते थे, सो न्होंने हवाई जहाज में बैल जोत लिए, सोचा कि नए ढंग की बैलगाड़ी है। और बैल जोत कर उससे काम लेने लगे। छोटा-सा हवाई जहाज था, होगा दो साट का हवाई जहाज, तो उसमें बैल जोत कर और उसको चलाने भी लगे। महीनों हवाई जहाज बैलगाड़ी ही रहा। तुम उस हवाई जहाज की दुर्दशा समझो। अगर हवाई जहाज को जरा भी होश होता तो जार-जार रोता, तो उसकी आंखों में आंसू टपकते कि यह मेरी क्या गति हो रही है ! इसके लिए मैं बना हूं ? ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर...बैल जुते हवाई जहाज में। मूढ़ों के हाथ में पड़ा जाएगा तो यही होना था।


फिर शहर से कोई आदमी आया। उसे भी हवाई जहाज का भाव अनुभव तो नहीं था, लेकिन बस और ट्रक उसने देखे थे। उसने कहा कि यह तुम क्या कर रहे हो ! इसमें बैल जोतने की जरूरत नहीं है। यह तो चोटी बस है।उसने कोशिश करके चलाने की चेष्टा की, दो –चार दिन में चल गया हवाई जहाज। तो बस की तरह कुछ दिन चला आदिवासी बहुत प्रसन्न हुए कि बिना बैल के गाड़ी चल रही है; बैल नहीं है गाड़ी चल रही है ! देखने आते आदिवासी दूर-दूर से। फिर उस आदमी ने जब शहर गया तो वहां लोगों को कहा कि ऐसा-ऐसा मामला हुआ, तब किसी ने उससे कहा कि पागल, वह बस नहीं है। तू जैसा वर्णन कर रहा है, वह हवाई जहाज है।


तो एक पायलट को लेकर वह आदमी जंगल पहुंचा और तब हवाई जहाज आकाश में उड़ सका। तब तो आदिवासियों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
हमारी हालत भी कुछ इसी ही हे हमारा जीवन हे हवाई जहाज
हम बैलगाड़ी ही बनाए हुए हैं उसे। घसीटते रहे हैं।


हम बने ही है आकाश में उड़ने को। न उड़े आकाश में तो फिर पैर घसीट कर ही चलना पड़ेगा। जमीन पर ही चलते रहेना हमारे के स्वभाव के प्रतिकूल है, अनुकूल नहीं। इसलिए जीवन इतना बोझिल है, इतना भारग्रस्त है।जीवन में दुख का एक ही अर्थ है कि हम स्वभाव के अनुकूल नहीं हैं, प्रतिकूल हैं।


दुःख सूचक है कि हम स्वभाव से चूक रहे हैं; कहीं हम मार्ग से उतर गए हैं; कही पटरी से उतर गए हैं। जैसे ही स्वभाव के अनुकूल होंगे, वैसे ही आनंद, वैसे ही अमृत की वर्षा होने लगेगी, लेकिन मनुष्य के पंख पक्षियों जैसे पंख नहीं हैं कि प्रकट हों; अप्रकट हैं। देह के नहीं चैतन्य के हैं। जिस आकाश की बात चल रही है, वह बाहर का आकाश नहीं, भीतर का आकाश है—अंतराकाश है जैसा आकाश बाहर है, वैसा ही आकाश भीतर भी है—इससे भी विराट, इससे भी विस्तीर्ण, इससे भी अनंत-अनंत गुना बड़ा। बाहर के आकाश की तो शायद कोई सीमा भी हो। वैज्ञानिक अभी निश्चित नहीं हैं कि सीमा है या नहीं।
दूसरे महायुद्ध बर्मा के एक जंगल में एक छोटा हवाई जहाज छूट गया जंगल में रहने वाले आदिवासी हवाई जहाज का क्या करें ! हवाई जहाज है, यह भी उसकी समझ में आए। वे तो बैलगाड़ी को ही जानते थे, सो उन्होंने हवाई जहाज में बैल जोत लिए, सोचा कि नए ढंग की बैलगाड़ी है। और बैल जोत कर उससे काम लेने लगे। छोटा-सा हवाई जहाज था, होगा दो साट का हवाई जहाज, तो उसमें बैल जोत कर और उसको चलाने भी लगे। महीनों हवाई जहाज बैलगाड़ी ही रहा। तुम उस हवाई जहाज की दुर्दशा समझो। अगर हवाई जहाज को जरा भी होश होता तो जार-जार रोता, तो उसकी आंखों में आंसू टपकते कि यह मेरी क्या गति हो रही है ! इसके लिए मैं बना हूं ? ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर...बैल जुते हवाई जहाज में। मूढ़ों के हाथ में पड़ा जाएगा तो यही होना था।






फिर शहर से कोई आदमी आया। उसे भी हवाई जहाज का भाव अनुभव तो नहीं था, लेकिन बस और ट्रक उसने देखे थे। उसने कहा कि यह तुम क्या कर रहे हो ! इसमें बैल जोतने की जरूरत नहीं है। यह तो चोटी बस है।उसने कोशिश करके चलाने की चेष्टा की, दोचार दिन में चल गया हवाई जहाज। तो बस की तरह कुछ दिन चला आदिवासी बहुत प्रसन्न हुए कि बिना बैल के गाड़ी चल रही है; बैल नहीं है गाड़ी चल रही है ! देखने आते आदिवासी दूर-दूर से। फिर उस आदमी ने जब शहर गया तो वहां लोगों को कहा कि ऐसा-ऐसा मामला हुआ, तब किसी ने उससे कहा कि पागल, वह बस नहीं है। तू जैसा वर्णन कर रहा है, वह हवाई जहाज है।






तो एक पायलट को लेकर वह आदमी जंगल पहुंचा और तब हवाई जहाज आकाश में उड़ सका। तब तो आदिवासियों के आश्चर्य का ठिकाना रहा।






हमारी हालत भी कुछ इसी ही हे हमारा जीवन हे हवाई जहाज



हम बैलगाड़ी ही बनाए हुए हैं उसे। घसीटते रहे हैं।



हम अनंत संपदा के मालिक हे



क्या होने को आए थे, क्या हो गए हो !






हम बने ही है आकाश में उड़ने को। उड़े आकाश में तो फिर पैर घसीट कर ही चलना पड़ेगा। जमीन पर ही चलते रहेना हमारे स्वभाव के प्रतिकूल है, अनुकूल नहीं। इसलिए जीवन इतना बोझिल है, इतना भारग्रस्त है।जीवन में दुख का एक ही अर्थ है कि हम स्वभाव के अनुकूल नहीं हैं, प्रतिकूल हैं।






दुःख सूचक है कि हम स्वभाव से चूक रहे हैं; कहीं हम मार्ग से उतर गए हैं; कही पटरी से उतर गए हैं। जैसे ही स्वभाव के अनुकूल होंगे, वैसे ही आनंद, वैसे ही अमृत की वर्षा होने लगेगी, लेकिन मनुष्य के पंख पक्षियों जैसे पंख नहीं हैं कि प्रकट हों; अप्रकट हैं। देह के नहीं चैतन्य के हैं। जिस आकाश की बात चल रही है, वह बाहर का आकाश नहीं, भीतर का आकाश हैअंतराकाश है जैसा आकाश बाहर है, वैसा ही आकाश भीतर भी हैइससे भी विराट, इससे भी विस्तीर्ण, इससे भी अनंत-अनंत गुना बड़ा। बाहर के आकाश की तो शायद कोई सीमा भी हो। वैज्ञानिक अभी निश्चित नहीं हैं कि सीमा है या नहीं।

नेताजी

अमृतसर के स्टेशन पर जब टिकट चैकर आया तो सरदार जी ने देखा कि उनके बगल मे बैठे सज्जन ने कह दिया कि मै तो नेता जी हूँ और टिकट चॅकर आगे बढ गया। इसी तरह स्टेशन के गेट पर भी वे बाहर निकल गये और कुली को पैसे भी नहीं दिये। सरदार जी यह देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुये। उन्होने भी यह तरकीब अपनाने की सोची। अगली बार जब वे कहीं जा रहे थे तो उन्होनें भी टिकट नहीं खरीदा। टिकट चेकर ने पूछा: टिकट दिखाइये।' अरे भाई, टिकट माँगते शर्म नहीं आती? मै इस देश का नेता हूँ? '' माफ़ करिये'--टिकट चेकर बोला-- 'आपका शुभ नाम क्या है? सरदार जी ने इसका कोई उत्तर तो सोचा नहीं था। सो वे घबरा गये और घबडाहट मे बोले: 'अरे मुझे जानते नहीं , मै इंदिरा गांधी हूँ !'टिकट चेकर भी सरदार था। पैर छूकर बोला : 'भैया, बडे दिनों से दर्शन की अभीलाषा थी, आज पूरी हुई।'

दुःख को मिटाने की तरकीब



छोटे दुःख को मिटाने की एक ही तरकीब है : बड़ा दुःख। फिर छोटे दुःख का पता नहीं चलता। इसीलिए तो लोग दुःख खोजते हैं; एक दुःख को भूलने के लिए और बड़ा दुःख खड़ा कर लेते हैं। बड़े दुःख के कारण छोटे दुःख का पता नहीं चलता। फिर दुःखों का अंबार लगाते जाते हैं। ऐसे ही तो तुमने अनंत जन्मों में अनंत दुःख इकट्ठे किए हैं। क्योंकि तुम एक ही तरकीब जानते हो : अगर कांटे का दर्द भुलाना हो तो और बड़ा कांटा लगा लो; घर में परेशानी हो, दुकान की परेशानी खड़ी कर लो—घर की परेशानी भूल जाती है; दुकान में परेशानी हो, चुनाव में खड़े हो जाओ—दुकान की परेशानी भूल जाती है। बड़ी परेशानी खड़ी करते जाओ। ऐसे आदमी नर्क को निर्मित करता है। क्योंकि एक ही उपाय दिखाई पड़ता है यहां कि छोटा दुःख भूल जाता है, अगर बड़ा दुःख हो जाएगा।



मकान में आग लगी हो, पैर में लगा काँटा पता नहीं चलता। क्यों ? कांटा गड़े तो पता चलना चाहिए। हॉकी के मैदान पर युवक खेल रहे हैं, पैर में चोट लग जाती है, खून की धारा बहती है—पता नहीं चलता। खेल बंद हुआ, रेफरी की सीटी बजी—एकदम पता चलता है। अब मन वापस लौट आया; दृष्टि आ गई।



तो ध्यान रखना, तुम्हारी आंख और आंख के पीछे तुम्हारी देखने की क्षमता अलग चीजें हैं। आंख तो खिड़की है, जिसमें खड़े होकर तुम देखते हो। आंख नहीं देखती; देखनेवाला आंख पर खड़े होकर देखता है। जिस दिन तुम्हें यह समझ में आ जाएगा कि देखनेवाला और आंख अलग है; सुननेवाला और और कान अलग है; उस दिन कान को छोड़कर सुनने वाला भीतर जा सकता है; आंख को छोड़कर देखने वाला भीतर जा सकता है—इंद्रिय बाहर पड़ी रह जाती है। इंद्रिय की कोई जरूरत भी नहीं है।


जागने पर जैसे स्वप्न अवास्तविक हो जाता है, वैसे ही स्व-बोध पर दुख खो जाता है।आनंद सत्य है, क्योंकि वह स्व है।

© OSHO International Foundation।

मोबाईल फ़ोन

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विचारक मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला सरुद्दीन के बेटे ने उससे पूछा : पापा, मेरे मास्टर कहते हैं कि दुनिया गोल है। लेकिन मुझे तो चपटी दिखाई पडती है। और डब्बू जी का लडका कहता है कि न तो गोल है , न चपटी , जमीन चौकोर है।

पापा ,आप तो बडे विचारक हैं , आप क्या कहते हैं ?


मुल्ला नसरुद्दीन ने आंखे बन्द की और विचारक बनने का ढोंग करने लगा। कुछ देर यूँ ही बैठा ही रहा, हाँलाकि उसके समझ मे कुछ नहीं आया ,सब बातें सिर से घूमती रहीं कि आज कौन सी फ़िल्म देखने जाऊं, क्या करुं क्या न करूं। बेटे ने कहा : पापा, बहुत देर हो गयी , अब तक आप पता नही लगा पाये कि दुनिया गोल है , चपटी या फ़िर चौकोर?मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा : बेटा , न तो दुनिया गोल है न चपटी न चौकोर। दुनिया चार सौ बीस है।

जागरूकता





राजा ने राजकुमार को तलवार बाजी सिखाने केलिए एक गुरु के पास भेजा वो गुरु भी अजिब था दरवाजे पर लिखा था की वह जागरूकता सिखाता हे । तो राजकुमार ने सोचा की केसा गुरु मिला हे जो जागरूकता सिखाता हे । में तो यहाँ तलवार बाजी सिखाने आया हु । दो तीन दिन बीत गए तो राजकुमार ने गुरु से पूछा कब आप तलवार बाजी सिखाना शुरु करोगे । गुरुने कहा की जल्दी मत कर ना । एक सप्ताह केबाद अचानक एक दिन लकडी की तलवार गुरु ने से पीछे से वार किया । और कहा के आज से शिक्षा शुरु अब तैयार रहेना । राजकुमार कूछ समज नहीं पाया.
अब रोज हमला होने लगा राजकुमार को गुरु पागल मालूम पड़ने लगा वो सोचने लगा के में यहाँ पे तलवार बाजी सिखाने आया पर ये क्या कर रहा हे . अब वो दिन में थोडा संभल कर रहे ने लगा नजाने वो पागल कब आजाये । उसकी सारी चेतना हमले से बचे ने लगी
तिन महीने हो गए अब वो कोय भी हमला करे तो वो रोक लेता तो गुरु ने कहा अब रात में भी तेयार रहेना फिर से रात में मार पड़ने लगी धीरे धीरे रात कोभी बोध रहेने लगा नीद में भी रक्षा होने लगी अब तो गुरु के पैरो की आवाज तक सुनाय देने लगी
छे महीने समाप्ते हुए राजकुमार ने सोचा की रोज गुरु मुजपे हमला करता हे तो में
क्यूना उसपे हमला करू .........
तभी गुरुने कहा के मुझ पे हमला मत कर ना राजकुमार को बड़ा आश्चर्य हुआ के मैने तो अभी सिर्फ सोचा था और आपको केसे पता चल गया गुरुने कहा थोड़े महीने तू ठहेर तुभी विचार पढ़ने लगेगा एक सालबाद जब राजकुमार की विदाय का दिन था और तलवार बाजी का मुकाबला था तब राजकुमार में कहा के आप ने कभी मुझे तलवार बाजी शिखाए नहीं में केसे .....गुरु ने कहा सब विद्या का मूल हे जागरूकता जब हिरा हाथमे हो तो फिर कंकड़ पत्थर का क्या काम ।

फ़िर मुकाबले में पहेली बार राजकुमार ने तलवार हाथमे ली और में वो जित गया


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इस बिजनेस की नीव हे डर ओर लालच

1…...आप जहा पे रहे ते हो वहा आस पास खाली जगह चुनो. पैसे देके जगह कभी न खरी दे
( सरकारी हो तो सब से अच्छा )
2…...फिर वहा भजन, कीर्तन , भोजन , कथा ,सब चालू करो
3…...धीरेधीरे पब्लिसीटी बढ़ाओ और रोज भोजन प्रसाद चालू करो
( क्यों की मन का रास्ता पेट से हो कर जाता हे )
किसी का मन जित ना हे तो उसे भोजन खिलावो साथ में दान पेटी रखो
4…... फिर सब भक्तजन ( हमारे ग्राहक ) आना सुरु होंगे
( क्यों की घर पर तो टाइम जाता नहीं टाइम पास के लिए आना जाना शुरु होंगे )
5…...फिर उस खाली जगह में सब को आगे कर के ( आप को पीछे रहे ना हे )
छोटा सा मंदिर बनाओ ( कोय भी देवी देवता का , अरे यार ३३ करोड़ मेसे कोय भी )
जिसे लोग डरे ओर लालच भी रहे क्यों के आप के बिजनेस की नीव हे डर ओर लालच

डर के बारे में थोडा जाने

आज मंदिर नहीं जाऊगा तो ये हो जायेगा , वो हो जायेगा देवी , देवता से डर ना चाहीये
मोत के बाद नर्क में जाना पड़ेगा तो अभी से थोडा दान कर ना जरुरी हे ( रिश्वत ऊपर भी चलती हें )
अपने ही धर्म में जीना दुसरे धर्म में जाना पाप हे ( कही अपना कस्टमर दूसरी जगह चला न जाये )
डरा ने के फिर बहोत सारे उपाय हें ( आप भी सोचो )

अब लालच के बारे थोडा जाने

मोत के बाद स्वर्ग मिलेगा जो दान पुण्य नहीं कर ते वो नर्क में जाये गे
ये सभी (सोफ्टवेर ) धर्मं वाले अलग अलग शब्दों में कहेते हे मगर सब का
मतलब एक ही होता हे
जीते जी आप को कोय आनंद नहीं करना हे सन्यासी की तरह जींदगी जियो
दान कर ते रहो तभी स्वर्ग मिले गा वरना नर्क में जाना पड़े गा
6…...अब डर में दो बाते हे जिसमे जिसका सोफ्टवेर डाला हे वाही वाला डरेगा वर्ना आप उसे
डरा नहीं पाएगे

दुनिया में कितने ही सोफ्टवेर हे पर सबसे ज्यादा चार सोफ्टवेर ज्यादा चल ते हे
जीसस हिन्दु इस्लाम बोध्धा


7…...जब बच्च पैदा होता हे तो उस में धीरे धीरे एक सोफ्टवेर डाला जाता हे
फिर जिंदगी भर उसे डरता हे
8…...जेसे आप कोय जीसस के सॉफ्टवर वाले को हिन्दु के सॉफ्टवर से नहीं डरा सकते
या इस्लाम के सोफ्टवेर वाले को हिन्दु ( शनि के साडेसाती से नहीं डरा सक ते )
अल्लाह से डराया जा सकता हे

पुरे साल में 150 सभी ज्याद त्यौहार आते हे

सभी मनाओ बाकि दिनों में भजन ,कीर्तन ,कथा ,सत्संग, शादी की विधि सब चलता रहे गा
१०फिर एक साल के बाद बड़े मंदिर के लिए डोनेसन जमा करो उस में भी डर और लालच का
उपयोग करो के आप को स्वर्ग में वो मिले गा , वर ना नर्क में जाना पड़ेग
11 तक मंदिर बने तब तक सब हरी भक्त सेवा लो ताकि उसे लगे के मंदिर हम ने बनाया हे
उसे बोलो आब आगे बढो हम आप के पीछे हे
12 एक डरे हुए लोगो का ट्रस्ट बनाओ जिसमे उनलोगों की उम्र 60 , 70 वाले ही हो
ताकि वो जल्द ही स्वर्ग में जाए और आप के हाथ में संचालन रहे

लो हो गया आप का कारोबार , अब आप की ब्रांच शुरु करो
एक शहर मेसे दुसरे शहर , लगेराहो मुना भाई
आप को यकींन नहीं आ रहा ......? तो देखो दुनिया का हाल
सबसे ज्यादा मंदिर ( दुकान ) किस की हे पता हे .......?

1…...जीसस ( चर्च ) दो लाख से ज्यादा ( पूरी दुनिया में )
2…... इस्लाम ( मस्जिद ) पचास हजार से ज्यादा
3…...बोध्धा ( मठ ) एक लाख से ज्यादा ( पूरी दुनिया में )
4…...हिन्दू ( मंदिर ) एक लाख से ज्यादा ( पूरी दुनिया में )

दुनिया की इन लाखो दुकानों में कोन सी प्रोडक्ट बिकती हे पता हे …………...अद्रश्य चीजे बिकती हे जो कभी दिखे नहीं देती [ invisible sell ]

जेसे परमात्मा , आस्था , करुना , प्रेम , दया , अहिंसा ओरभी बहोत कुछ भी पर वो अद्रश्य होनी चाही ये

ज्यादातर दुकानों में स्टोक नहीं होता फिर भी बिकती हे क्योकि ये अद्रश्य हे

किसी भी बात को कहानी से बताये

एक ९० साल बुजुर्ग डाक्टर से : डा. सा. मेरी १८ साल की पत्नी गर्भवती हो गयी है , आप की राय जानना चाहूगाँ ।
डाक्टर : मै आपको एक कहानी सुनाता हूँ , " एक शिकारी ने हडबडी मे घर से निकलते समय बन्दूक की जगह छाता साथ मे रख लिया , जंगल मे अचानक उसका सामना शेर से हो गया , उसने छाते का हत्था खोला और शेर की ओर निशाना साधते हुये ट्रिगर दबाया ,धाँय !!
और शेर मर गया !!! "
"यह हो ही नही सकता । किसी और ने निशाना लगाया होगा ।"
डाक्टर : बिल्कुल यही तो मै कहना चाहता हूँ :) :)

अभय



बाहर की संपत्ति जितनी बढ़ती है, उतना ही भय बढ़ता जाता है- जब कि लोग भय को मिटाने को ही बाहर की संपत्ति के पीछे दौड़ते हैं! काश! उन्हें ज्ञात हो सके कि एक और संपदा भी है, जो कि प्रत्येक के भीतर है। और, जो उसे जान लेता है, वह अभय हो जाता है।
अमावस की संध्या थी। सूर्य पश्चिम में ढल रहा था आर शीघ्र ही रात्रि का अंधकार उतर आने को था। एक वृद्ध संन्यासी अपने युवा शिष्य के साथ वन से निकलते थे। अंधेरे को उतरते देख उन्होंने युवक से पूछा, ''रात्रि होने को है, बीहड़ वन है। आगे मार्ग में कोई भय तो नहीं है?''
इस प्रश्न को सुन युवा संन्यासी बहुत हैरान हुआ। संन्यासी को भय कैसा? भय बाहर तो होता नहीं, उसकी जड़े तो निश्चय ही कहीं भीतर होती हैं!
संध्या ढले, वृद्ध संन्यासी ने अपना झोला युवक को दिया और वे शौच को चले गये। झोला देते समय भी वे चिंतित और भयभीत मालूम हो रहे थे। उनके जाते ही युवक ने झोला देखा, तो उसमें एक सोने की ईट थी! उसकी समस्या समाप्त हो गयी। उसे भय का कारण मिल गया था। वृद्ध ने आते ही शीघ्र झोला अपने हाथ में ले लिया और उन्होंने पुन: यात्रा आरंभ कर दी। रात्रि जब और सघन हो गई और निर्जन वन-पथ पर अंधकार ही अंधकार शेष रह गया, तो वृद्ध ने पुन: वही प्रश्न पूछा। उसे सुनकर युवक हंसने लगा और बोला, ''आप अब निर्भय हो जावें। हम भय के बाहर हो गये हैं।'' वृद्ध ने साश्चर्य युवक को देखा और कहा, ''अभी वन कहां समाप्त हुआ है?'' युवक ने कहा, ''वन तो नहीं भय समाप्त हो गया है। उसे मैं पीछे कुएं मैं फेंक आया हूं।'' यह सुन वृद्ध ने घबराकर अपना झोला देखा। वहां तो सोने की जगह पत्थर की ईट रखी थी। एक क्षण को तो उसे अपने हृदय की गति ही बंद होती प्रतीत हुई। लेकिन, दूसरे ही क्षण वह जाग गया और वह अमावस की रात्रि उसके लिए पूर्णिमा की रात्रि बन गयी। आंखों में आ गए इस आलोक से आनंदित हो, वह नाचने लगा। एक अद्भुत सत्य का उसे दर्शन हो गया था। उस रात्रि फिर वे उसी वन में सो गये थे। लेकिन, अब वहां न तो अंधकार था, न ही भय था!
संपत्ति और संपत्ति में भेद है। वह संपत्ति जो बाह्य संग्रह से उपलब्ध होती है, वस्तुत: संपत्ति नहीं है, अच्छा हो कि उसे विपत्ति ही कहें! वास्तविक संपत्ति तो स्वयं को उघाड़ने से ही प्राप्त होती है। जिससे भय आवे, वह विपत्ति है- और जिससे अभय, उसे ही मैं संपत्ति कहता हूं।
आप भी देखे आप के झोले में भी तो कही ...................
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